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स्वामी विवेकानन्द का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानन्द का नाम भारतीय नवजागरण के आन्दोलनों के सूत्रधारों में प्रमुख रूप से लिया जाता है। उन्होंने केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक भारतीय आध्यात्मिकता एवं संस्कृति का प्रचार प्रसार किया। उन्होंने अपने गुरु से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर इसे आध्यात्मिक साधना के माध्यम से धर्म जगत में एक नया रूप प्रदान किया। उन्होंने लोगों को संदेश दिया और बताया कि मनुष्य संसार में सबसे ऊपर का प्राणी है। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व बन्धुत्व व मानव सेवा को जन जन तक पहुँचा इसे मुक्ति का मार्ग बताया। स्वामी विवेकानन्द ने परमहंस के उस सिद्धान्त को सर्वत्र प्रचारित किया जिसमें कहा गया है ”'सर्वधर्म समन्वय'”। वेद का प्रथम सूत्र है “नर नारायण की सेवा” । समाज की उन्नति और कल्याण के लिए सबसे अधिक आवश्यक है कि देशवासी मनुष्य बनें वे हमेशा यह प्रार्थना करते थे कि "हे ईश्वर! मेरे देश के निवासियों को मनुष्य बनाओ।


स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ”शरीर और आत्मा मिलकर मनुष्य बनते हैं। शरीर तो आत्मा का मन्दिर है। सुन्दर मन्दिर में सुन्दर विग्रह के रहने पर 'सोने पर सुहागा' होता है।' इसलिए शरीर रूपी मन्दिर को स्वच्छ बनाओ। हमारे पूर्वज कह गये हैं “शरीरमायं खलु धर्म साधनम” देह मन्दिर और विग्रह आत्मा है। आत्मा ही ईश्वर है तथा आत्मा के प्रति अविश्वास का अर्थ नास्तिकता है।

जन्म एवं पारिवारिक परिचय- स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 ई. को कलकत्ता में मुखर्जी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ व माता का नाम भुवनेश्वरी था। इनके पिता एक स्वच्छन्द प्रवृत्ति के मालिक थे तथा माता सुशिक्षित तथा शालीनता सम्पन्न महिला थी। स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम वीरेश्वर रखा गया था। परिवार के सभी लोग प्यार से इन्हें वीरे कहते थे। नामकरण के समय इनका नाम नरेन्द्र नाथ रखा गया था। नरेन्द्र बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। वे एक अच्छे तैराक, कुशल अश्वारोही, कुशल पहलवान तथा संगीत के अच्छे जानकार थे।

बचपन से ही नरेन्द्र साधु संन्यासियों से काफी प्रभावित होते थे। शायद नरेन्द्र के पूर्व जन्म के संस्कार ही थे कि एक दिन खेल खेल में बालक नरेन्द्र शरीर पर राख लगाकर ध्यान की अवस्था में बैठ गये और वे ध्यान में इतना मग्न हो गये कि अन्य बच्चों के सांप देखकर चिल्लाने पर भी वह ध्यान से नहीं उठे। काफी देर बाद सांप के चले जाने पर परिवार के लोगों ने नरेन्द्र से सांप के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मुझे कुछ नहीं मालूम। इस घटना से बालक नरेन्द्र के अध्यात्मिक स्तर का दर्शन हो चुका था। इनकी शिक्षा पांच वर्ष की आयु में आरम्भ हुई तथा अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि होने के कारण ये सभी विषयों को सफलता से ग्रहण कर लेते थे। 14 वर्ष की आयु में यह अपने पिता के पास मध्य प्रदेश, रायपुर में रहते थे, जहाँ इनके पिता जी इनको व्यवहारिक शिक्षा भी दिया करते थे। 2 वर्ष रायपुर रहने के बाद वह वापस कलकत्ता आ गये तथा अंग्रजी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने लगे। इन्होंने सन्‌ 1884 ई. में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। कालेज में विज्ञान, ज्योतिष, गणित, दर्शन, भारतीय तथा यूरोपियन भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त करके इन्होंने सबको आश्चर्य चकित कर दिया। इसके साथ साथ इन्होंने वेदान्त व अन्य धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया। कुछ समय के लिए वे ब्रह्मसमाज के अनुयायी रहे, परन्तु यहां उनकी आध्यात्मिक भूख शान्त नहीं हुई और वे ऐसे महापुरुष की तलाश में जुट गये जो उन्हें ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करा सके।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस से सम्पर्क- ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने की प्रगाढ़ जिज्ञासा ने उनकी भेंट नवम्बर 1880 में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी से करायी। उन दिनों स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के प्रति लोगों की बड़ी श्रद्धा थी। पहली ही भेंट में स्वामी रामकृष्ण परमहंस समझ चुके थे कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। इनसे मिलकर स्वामी रामकृष्ण जी ने कहा कि मैं बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा था और चाह रहा था कि मैं अपनी आत्मा की आन्तरिक अनुभूतियों को किसी योग्य पात्र को सौंप सकूँ। नरेन्द्र भी रामकृष्ण परमहंस जी से मिलकर अति प्रसन्न थे क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें अब सद्गुरु मिल गया है। नरेन्द्र ने परमहंस जी से निवेदन किया कि मुझे शान्ति चाहिए। रामकृष्ण परमहंस जी के सम्पर्क में आने का कारण नरेन्द्र की ज्ञान पिपासा ही थी। वे संसार की समस्त नदियों के समुद्र में मिलने की ही भॉति अपने इष्ट से मिलना चाहते थे। नरेन्द्र की जिज्ञासा व ज्ञान स्तर जानकर परमहंस जी ने कहा था "मेरा नरेन्द्र सामान्य मानव नहीं है। वह तो ब्रह्मलोक का ऋषि है। उसमें बाल्मिकी, बुद्ध, शंकर की आत्माऐं प्रवेश कर गयी हैं।'

कुछ दिनों पश्चात पिता की मृत्यु हो जाने पर परिवार के भरण पोषण का दायित्व नरेन्द्र पर आ पड़ा। इस कार्य को पूरा करने के लिए नरेन्द्र ने नौकरी की और कभी कभी परमहंस जी से भी मिलते रहे। गुरु परमहंस जी की कृपा से इनका अभ्यास और वैराग्य दृढ़ होता चला गया जिससे ये निर्विकल्प समाधि तक पहुच गए। स्वामी परमहंस जी ने अपनी मृत्यु से तीन चार दिन पूर्व नरेन्द्र को बुलाकर कहा कि मैंने अपना सबकुछ तुम्हें दे दिया है। अब तुम इस ज्ञान को जन जन तक पहुँचाओं और सभी कार्यों को पूरा करो।

हिमालय भ्रमण- गुरु की मृत्यु पश्चात स्वामी विवेकानन्द ने एक साधना केन्द्र की स्थापना की तथा अपने साथियों और शिष्यों सहित आध्यात्मिक भगवत् भजन में लग गये। पाँच वर्ष पश्चात सन् 1891 में वे अपनी मित्र मण्डली को छोड़कर भ्रमण करने के लिए हिमालय की ओर निकल पड़े। वहाँ विभिन्न सिद्ध महात्माओं से सम्पर्क कर आध्यात्मिक विकास प्राप्त किया। धीरे धीरे उनकी वेदान्त में दृढ़ आस्था हो गयी थी। भारत के विभिन्न प्रान्तों में उनके शिष्यों की संख्या बहुत अधिक हो गयी।

विदेश यात्रा- गुरु ज्ञान के प्रचार प्रसार हेतु स्वामी जी लंका, सिंगापुर, हांगकांग, नागासाकी, ओसाका, टोकियों होते हुए कनाडा गये और वहाँ से शिकागों पहुँचे। इसी दौरान हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जे.एच. राइट ने स्वामी जी के भाषणों से प्रभावित होकर तुरन्त आगामी धर्म सभा में भाषण के लिए अवसर दिया।

11 सितम्बर 1893 ई. का दिन एक ऐतिहासिक दिन था। उस दिन भारत के इस महान सन्त ने सभी धर्म प्रतिनिधियों को हिलाकर रख दिया। इस सभा में सभी देशों के प्रतिनिधि अपना भाषण लिखकर लाये थे जबकि स्वामी विवेकानन्द जी ने अलिखित भाषण दिया था।

अपने भाषण कें आरंभ में उन्होंने पाश्चात्य परम्परा के विरुद्ध मेरे अमेरिका निवासी भाईयो तथा बहिनों जैसे ही सम्बोधित किया, वैसे ही हाल के अधिकांश लोग खड़े होकर इस महान सन्त के सम्मान मे कई मिनट तक तालियां बजाते रहे। यह अमेरिका के इतिहास की पहली घटना थी, स्वामी जी का भाषण सुनकर लोगों के अन्दर के तार झंकृत हो उठे। इस भाषण में स्वामी जी ने भगवत गीता और उपनिषदों के ज्ञान का सारांश प्रस्तुत किया। धीरे धीरे अमेरिका में स्वामी जी के भक्तों की संख्या बढती गयी। लगभग तीन वर्ष रहने के पश्चात स्वामी जी 16 सितम्बर 1896 में स्वदेश लौट आये। स्वदेश लौटने पर अपना प्रचार कार्य प्रारम्भ करने के साथ साथ उन्होंने दो मठों की स्थापना की।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना- स्वदेश लौटने पर स्वामी जी ने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य वेदान्त प्रचार व लोक सेवा करना है। इसी बीच में भारत में महामारी का प्रकोप फैलने पर स्वामी जी ने संन्यासियों की एक मण्डली सेवा कार्य में लगा दी इसी दौरान इन्होंने कई अनाथालय और वेदान्त प्रचार के लिए विद्यालयों की स्थापना की। विदेशों में भी चल रहे आन्दोलनों की प्रगति को देखने के लिए स्वामी जी समय समय पर विदेश भ्रमण पर रहा करते थे। अत्यधिक परिश्रम के कारण इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। इन दिनों में वे अक्सर समाधि में लीन रहते थे। समाधि के पश्चात वे शिष्यों को व्याकरण वेद आदि पढ़ाया करते थे। इसी प्रकार आध्यात्मिक और सामाजिक कार्य करते हुए उन्होंने समाधि की अवस्था में इस पंचभौतिक शरीर को त्याग दिया। अपने सामाजिक व आध्यात्मिक कार्यों के लिए वे सदा के लिए भारत की धरोहर के रूप में अमर हो गये। भारत माता के इन सच्चे सपूत को हमारा सत्-सत् नमन्।


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