Skip to main content

कठोपनिषद (Kathopanishad) का परिचय

 कठोपनिषद प्रमुख उपनिषदों में से एक है और यह कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। इसे भारतीय दर्शन, विशेष रूप से अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपनिषद में आत्मा, मृत्यु, मोक्ष और ब्रह्म की गूढ़ व्याख्या की गई है। कठोपनिषद का मुख्य कथानक नचिकेता और यमराज के संवाद पर आधारित है, जिसमें नचिकेता आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या के रहस्यों को जानने के लिए यमराज से गहन प्रश्न पूछते हैं। 

कठोपनिषद को दो अध्यायों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्ली (खंड) होते हैं। इसका मूल विषय आत्मा और परमात्मा का स्वरूप है, जो नचिकेता और यमराज के संवाद के माध्यम से समझाया गया है।

यम-नचिकेता संवाद 

इस उपनिषद की कथा एक ऋषि वाजश्रवस के पुत्र नचिकेता से प्रारंभ होती है, जिसे उसके पिता ने यज्ञ के दौरान क्रोधित होकर यमराज को दान कर दिया। नचिकेता मृत्यु के देवता यमराज के पास पहुंचता है और उनसे तीन वरदान मांगता है।

पहला वरदान: अपने पिता की शांति और प्रेम प्राप्त करना।

दूसरा वरदान: स्वर्गलोक प्राप्त करने की विधि का ज्ञान।

तीसरा वरदान: मृत्यु के बाद आत्मा के अस्तित्व और ब्रह्मज्ञान का रहस्य।

तीसरे वरदान के उत्तर में यमराज नचिकेता को आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष का ज्ञान प्रदान करते हैं। वे समझाते हैं कि आत्मा अविनाशी और शाश्वत है, और जो व्यक्ति इसे जान लेता है, वही मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

मुख्य दार्शनिक सिद्धांत

आत्मा की अमरता:- यमराज नचिकेता को बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह नित्य, अविनाशी और अजन्मा है।

श्रेयस और प्रेयस का चयन:- यमराज दो मार्ग बताते हैं—श्रेयस (कल्याणकारी) और प्रेयस (इच्छाओं की पूर्ति करने वाला)। बुद्धिमान व्यक्ति श्रेयस को अपनाता है, जबकि अज्ञानी प्रेयस की ओर आकर्षित होता है।

ब्रह्मविद्या का महत्व:- ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु की शरण में जाना आवश्यक है, क्योंकि केवल आत्मज्ञान ही व्यक्ति को मृत्यु के भय से मुक्त कर सकता है।

ओम् का महत्व:- ओम् को ब्रह्म का प्रतीक बताया गया है, और इसके ध्यान से व्यक्ति ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है।

इंद्रियों का संयम:- मनुष्य को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि वे बाह्य विषयों की ओर आकर्षित करती हैं। आत्मा को जानने के लिए मन और इंद्रियों को संयमित करना आवश्यक है।

सांसारिक सुखों की निरर्थकता

कठोपनिषद सांसारिक सुखों को तुच्छ और अस्थायी बताता है। यमराज नचिकेता को स्वर्ग, ऐश्वर्य, धन-धान्य और सांसारिक आनंद प्रदान करने का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन नचिकेता इन सबको ठुकरा देता है। वह समझता है कि ये सभी चीजें नश्वर हैं और आत्मा की सच्ची शांति के लिए बाधक हैं। उपनिषद कहता है:

"न वस्तु लभ्यते धनैः"

अर्थात्, धन और सांसारिक साधनों से आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। ये भौतिक वस्तुएँ हमें क्षणिक आनंद दे सकती हैं, लेकिन इनसे अंततः असंतोष ही उत्पन्न होता है।

आत्मज्ञान की महिमा

आत्मज्ञान वह मार्ग है, जो व्यक्ति को आत्मा की पहचान कराता है और उसे परम सत्य से जोड़ता है। कठोपनिषद के अनुसार, आत्मज्ञान से ही व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है। यह ज्ञान किसी साधारण व्यक्ति को नहीं प्राप्त होता, बल्कि वही इसे प्राप्त कर सकता है जो सत्य की खोज में समर्पित हो।

यमराज नचिकेता को बताते हैं कि आत्मज्ञान वह दिव्य प्रकाश है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटा देता है। यह ज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न इसे कोई नष्ट कर सकता है। आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने से व्यक्ति भयमुक्त हो जाता है और उसे वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है।

आत्मा की अमरता

कठोपनिषद आत्मा की अमरता को स्पष्ट करता है। इसमें कहा गया है कि आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है। यह अजन्मा, अविनाशी और शाश्वत है। इसका कोई अंत नहीं है और न ही इसे कोई नष्ट कर सकता है। कठोपनिषद में कहा गया है:

"न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।"

अर्थात, आत्मा का न तो जन्म होता है, न ही मृत्यु। यह नित्य और शाश्वत है। यह शरीर नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा सदैव बनी रहती है।

ज्ञान प्राप्ति की शर्तें

कठोपनिषद में ज्ञान प्राप्ति के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लेख किया गया है:

गुरु की शरण में जाना:- आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए एक योग्य गुरु की आवश्यकता होती है। केवल वेदों के अध्ययन से आत्मज्ञान संभव नहीं, बल्कि एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन से ही इसे पाया जा सकता है।

सत्य और तपस्या का पालन:- सत्य और तपस्या के बिना आत्मज्ञान संभव नहीं। नचिकेता अपनी सत्यनिष्ठा और धैर्य से ही यमराज से ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हुआ।

वैराग्य एवं आत्मसंयम:- सांसारिक सुखों का त्याग और आत्मसंयम आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। नचिकेता सांसारिक सुखों को अस्वीकार करता है और केवल आत्मा के सत्य को जानने के लिए प्रयासरत रहता है।

इच्छाओं का नियंत्रण:- मन और इंद्रियों का संयम बहुत आवश्यक है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को वश में कर लेता है, वही सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

ज्ञान की धार

ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसे बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। कठोपनिषद में बताया गया है कि ज्ञान एक तीव्र धार वाली तलवार के समान है, जिस पर चलना कठिन है। यदि व्यक्ति थोड़ी भी चूक कर दे, तो वह फिर से अज्ञान के अंधकार में गिर सकता है। इसलिए, आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद सतत अभ्यास और सत्संगति की आवश्यकता होती है।

ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को अपने अहंकार से मुक्त होना चाहिए और इसे दूसरों के कल्याण के लिए प्रयोग करना चाहिए। कठोपनिषद के अनुसार:

"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"

अर्थात, उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है और इससे ही व्यक्ति को सच्ची मुक्ति मिलती है।

कठोपनिषद हमें यह सिखाता है कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं और आत्मज्ञान ही वास्तविक आनंद की कुंजी है। आत्मा अमर है और इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए सत्य, तपस्या, गुरु की शरण और वैराग्य आवश्यक हैं। इस उपनिषद के अनुसार, जो व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह भय, दुख और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

इन्द्रिय ज्ञान का स्वरूप

इन्द्रिय ज्ञान वह है जो हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) के माध्यम से हमें प्राप्त होता है। यह ज्ञान बाहरी जगत से संबंधित होता है और परिवर्तनशील होता है। कठोपनिषद में कहा गया है कि इन्द्रियों का ज्ञान मायामय है और यह हमें सत्य की अनुभूति से दूर ले जाता है।

इन्द्रिय ज्ञान की सीमाएँ

परिवर्तनशीलता:- इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान स्थायी नहीं होता। एक वस्तु जो हमें एक समय में सुखद लगती है, वही किसी अन्य समय में दुखद लग सकती है।

असत्य की ओर ले जाने वाला:- इन्द्रिय ज्ञान हमें बाह्य जगत में उलझा कर आत्मज्ञान से दूर कर देता है।

माया का प्रभाव:- इन्द्रिय ज्ञान माया से प्रभावित होता है और हमें असत्य की ओर आकर्षित करता है।

सीमितता:- इन्द्रियाँ केवल भौतिक संसार की सीमाओं के भीतर ही ज्ञान प्राप्त कर सकती हैं, किंतु आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान इससे परे है।

अविभाज्य और सर्वोच्च अवस्था

कठोपनिषद में आत्मा को अविभाज्य और सर्वोच्च अवस्था में स्थित बताया गया है। इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा न तो किसी से बँटी हुई है, न ही इसे विभाजित किया जा सकता है। यह समस्त सृष्टि में व्याप्त है और सदा एकरस बनी रहती है।

आत्मा की अविभाज्यता के प्रमाण

सर्वव्यापकता:- आत्मा संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है और किसी एक स्थान पर सीमित नहीं है।

अविनाशीता:- आत्मा को नष्ट नहीं किया जा सकता। गीता में भी कहा गया है – नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

एकत्व:- आत्मा केवल एक है, उसमें कोई भेद नहीं है। यह सभी जीवों में समान रूप से व्याप्त है।

नित्य और अपरिवर्तनीय:- आत्मा काल, स्थान और परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त रहती है।

सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति

कठोपनिषद यह सिखाता है कि जो व्यक्ति इन्द्रिय सुखों को त्याग कर आत्मा का साक्षात्कार करता है, वही सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करता है। यह अवस्था केवल ध्यान, साधना और आत्मचिंतन से प्राप्त की जा सकती है।

आत्मज्ञान प्राप्ति के उपाय

ध्यान और योग:- योग और ध्यान के माध्यम से इन्द्रियों को नियंत्रित कर आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है।

सत्संग और अध्ययन:-  धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और सत्संग आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

वैराग्य:- सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर ही आत्मज्ञान संभव है।

स्वयं को जानना:- कठोपनिषद में कहा गया है कि जो स्वयं को जान लेता है, वही सत्य को प्राप्त करता है।

कठोपनिषद के अनुसार योग की परिभाषा

कठोपनिषद में योग की परिभाषा अत्यंत सारगर्भित और गूढ़ रूप में दी गई है। इसमें योग को इंद्रियों, मन और बुद्धि के संयम और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग बताया गया है। कठोपनिषद में कहा गया है:

"तं योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।

अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥" (कठोपनिषद 2.3.10)

जब इंद्रियों का स्थिर रूप से धारण (संयम) किया जाता है, तब उसे योग कहा जाता है। इस अवस्था में साधक पूर्ण रूप से सतर्क (अप्रमत्त) रहता है। योग का स्वरूप प्रभव और अप्यय (उत्पत्ति और लय) के पार है, अर्थात् यह नित्य और शाश्वत है।

कठोपनिषद के अनुसार, योग वह अवस्था है, जब मन, इंद्रियां और बुद्धि पूर्ण रूप से आत्मा में एकाग्र हो जाती हैं। यह परमात्मा के साथ मिलन का साधन है, जिसमें बाहरी और आंतरिक विक्षेप समाप्त हो जाते हैं।

निष्कर्ष

कठोपनिषद हमें सिखाता है कि इन्द्रिय ज्ञान सीमित और अस्थायी होता है, जबकि आत्मा अविभाज्य और सर्वोच्च अवस्था में स्थित रहती है। इसे केवल आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान और आत्मचिंतन से ही जाना जा सकता है। जब कोई व्यक्ति अपने इन्द्रिय सुखों से परे आत्मज्ञान को प्राप्त करता है, तब वह मुक्त होकर सर्वोच्च अवस्था में स्थापित हो जाता है। यही वास्तविक मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति है।

केनोपनिषद् (Kenopanishad) का परिचय

ईशावास्योपनिषद: (Ishavasyopanishad) का परिचय


Comments

Popular posts from this blog

"चक्र " - मानव शरीर में वर्णित शक्ति केन्द्र

7 Chakras in Human Body हमारे शरीर में प्राण ऊर्जा का सूक्ष्म प्रवाह प्रत्येक नाड़ी के एक निश्चित मार्ग द्वारा होता है। और एक विशिष्ट बिन्दु पर इसका संगम होता है। यह बिन्दु प्राण अथवा आत्मिक शक्ति का केन्द्र होते है। योग में इन्हें चक्र कहा जाता है। चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के परिपथ का निर्माण करते हैं। यह परिपथ मेरूदण्ड में होता है। चक्र उच्च तलों से ऊर्जा को ग्रहण करते है तथा उसका वितरण मन और शरीर को करते है। 'चक्र' शब्द का अर्थ-  'चक्र' का शाब्दिक अर्थ पहिया या वृत्त माना जाता है। किन्तु इस संस्कृत शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ चक्रवात या भँवर से है। चक्र अतीन्द्रिय शक्ति केन्द्रों की ऐसी विशेष तरंगे हैं, जो वृत्ताकार रूप में गतिमान रहती हैं। इन तरंगों को अनुभव किया जा सकता है। हर चक्र की अपनी अलग तरंग होती है। अलग अलग चक्र की तरंगगति के अनुसार अलग अलग रंग को घूर्णनशील प्रकाश के रूप में इन्हें देखा जाता है। योगियों ने गहन ध्यान की स्थिति में चक्रों को विभिन्न दलों व रंगों वाले कमल पुष्प के रूप में देखा। इसीलिए योगशास्त्र में इन चक्रों को 'शरीर का कमल पुष्प” कहा ग...

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम

हठयोग प्रदीपिका में प्राणायाम को कुम्भक कहा है, स्वामी स्वात्माराम जी ने प्राणायामों का वर्णन करते हुए कहा है - सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतल्री तथा।  भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुंम्भका:।। (हठयोगप्रदीपिका- 2/44) अर्थात् - सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी में आठ प्रकार के कुम्भक (प्राणायाम) है। इनका वर्णन ऩिम्न प्रकार है 1. सूर्यभेदी प्राणायाम - हठयोग प्रदीपिका में सूर्यभेदन या सूर्यभेदी प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है - आसने सुखदे योगी बदध्वा चैवासनं ततः।  दक्षनाड्या समाकृष्य बहिस्थं पवन शनै:।।  आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि क्रुंभयेत। ततः शनैः सव्य नाड्या रेचयेत् पवन शनै:।। (ह.प्र. 2/48/49) अर्थात- पवित्र और समतल स्थान में उपयुक्त आसन बिछाकर उसके ऊपर पद्मासन, स्वस्तिकासन आदि किसी आसन में सुखपूर्वक मेरुदण्ड, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए बैठेै। फिर दाहिने नासारन्ध्र अर्थात पिंगला नाडी से शनैः शनैः पूरक करें। आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक के समय मूलबन्ध व जालन्धरबन्ध लगा कर रखें।  यथा शक्ति कुम्भक के प...

सांख्य दर्शन परिचय, सांख्य दर्शन में वर्णित 25 तत्व

सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल है यहाँ पर सांख्य शब्द का अर्थ ज्ञान के अर्थ में लिया गया सांख्य दर्शन में प्रकृति पुरूष सृष्टि क्रम बन्धनों व मोक्ष कार्य - कारण सिद्धान्त का सविस्तार वर्णन किया गया है इसका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है। 1. प्रकृति-  सांख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुण अर्थात सत्व, रज, तम तीन गुणों के सम्मिलित रूप को त्रिगुण की संज्ञा दी गयी है। सांख्य दर्शन में इन तीन गुणो कों सूक्ष्म तथा अतेनद्रिय माना गया सत्व गुणो का कार्य सुख रजोगुण का कार्य लोभ बताया गया सत्व गुण स्वच्छता एवं ज्ञान का प्रतीक है यह गुण उर्ध्वगमन करने वाला है। इसकी प्रबलता से पुरूष में सरलता प्रीति,अदा,सन्तोष एवं विवेक के सुखद भावो की उत्पत्ति होती है।    रजोगुण दुःख अथवा अशान्ति का प्रतीक है इसकी प्रबलता से पुरूष में मान, मद, वेष तथा क्रोध भाव उत्पन्न होते है।    तमोगुण दुख एवं अशान्ति का प्रतीक है यह गुण अधोगमन करने वाला है तथा इसकी प्रबलता से मोह की उत्पत्ति होती है इस मोह से पुरूष में निद्रा, प्रसाद, आलस्य, मुर्छा, अकर्मण्यता अथवा उदासीनता के भाव उत्पन्न होते है सा...

योगवशिष्ठ ग्रन्थ का सामान्य परिचय

मुख्य विषय- 1. मनोदैहिक विकार, 2. मोक्ष के चार द्वारपाल, 3. ज्ञान की सप्तभूमि, 4. ध्यान के आठ अंग, 5. योग मार्ग के विघ्न, 6. शुक्रदेव जी की मोक्ष अवधारणा  1. योग वशिष्ठ के अनुसार मनोदैहिक विकार- मन के दूषित होने पर 'प्राणमय कोष' दूषित होता हैं, 'प्राणमय' के दूषित होने से 'अन्नमय कोष' अर्थात 'शरीर' दूषित होता है, इसे ही मनोदैहिक विकार कहते हैं:- मन -> प्राण -> अन्नमय (शरीर) योग वशिष्ठ के अनुसार आधि- व्याधि की अवधारणा- Concept of Adhis and Vyadhis आधि- अर्थात- मानसिक रोग > मनोदैहिक विकार > व्याधि- अर्थात- शारीरिक रोग आधि एवं व्याधि का संबंध पंचकोषों से है: आधि- (Adhis) 1. आनंदमय कोष:- इस कोष में स्वास्थ्य की कोई हानि नहीं होती इसमें वात, पित व कफ की समरूपता रहती है। 2. विज्ञानमय कोष:- इस कोष में कुछ दोषों की सूक्ष्म प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इसमें अभी रोग नहीं बन पाते क्योंकि इसमें दोषों की प्रक्रिया ठीक दिशा में नहीं हो पाती। 3. मनोमय कोष:- इस कोष में वात, पित व कफ की असम स्थिति शुरू होती है यहीं पर 'आधि' की शुरुआत होती है। (आधि= मान...

UGC NET Yoga Previous year Question Paper PDF in Hindi

 UGC NET Yoga Previous year Question Paper in Hindi (Set-6) नोट :- इस प्रश्नपत्र में (25) बहुसंकल्पीय प्रश्न है। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक है। सभी प्रश्न अनिवार्य ।   1. सर्वाइकल स्पॉडिलोसिस में कौन-से आसन नहीं करने चाहिये ? (a) मकरासन   (b) भुजंगासन (c) शशांकासन (d) पादहस्तासन कूट के अनुसार सही संयोजन चुनें : कूट : (1) (a) और (c) सही हैं।    (2) (c) और (d) सही हैं। (3) (a) और (b) सही हैं।    (4) (b) और (c) सही हैं। 2. निम्न में से कौन तनाव जनित रोग हैं ? (a) सिर-दर्द  (b) उच्च रक्तचाप (c) मधुमेह   (d) आँटिस्म कूट के अनुसार सही संयोजन चुनें : कूट : (1) (a), (b) और (c) सही हैं।     (2) (a), (b) और (c) सही हैं। (3) (b), (c) और (d) सही हैं।     (4) (a) और (d) सही हैं। 3. धनुरासन निम्न में से किन में निषिद्ध है ? (a) उच्च रक्तचाप    (b) विबन्ध (c) पेट का मोटापा    (d) हर्निया कूट के अनुसार सही संयोजन चुनें :   कूट : (1) (b) और (c) सही हैं। ...

चित्त विक्षेप | योगान्तराय

चित्त विक्षेपों को ही योगान्तराय ' कहते है जो चित्त को विक्षिप्त करके उसकी एकाग्रता को नष्ट कर देते हैं उन्हें योगान्तराय अथवा योग के विध्न कहा जाता।  'योगस्य अन्तः मध्ये आयान्ति ते अन्तरायाः'।  ये योग के मध्य में आते हैं इसलिये इन्हें योगान्तराय कहा जाता है। विघ्नों से व्यथित होकर योग साधक साधना को बीच में ही छोड़कर चल देते हैं। विध्न आयें ही नहीं अथवा यदि आ जायें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जाये, ऐसी दया ईश्वर ही कर सकता है। यह तो सम्भव नहीं कि विध्न न आयें। “श्रेयांसि बहुविध्नानि' शुभकार्यों में विध्न आया ही करते हैं। उनसे टकराने का साहस योगसाधक में होना चाहिए। ईश्वर की अनुकम्पा से यह सम्भव होता है।  व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः (योगसूत्र - 1/30) योगसूत्र के अनुसार चित्त विक्षेपों  या अन्तरायों की संख्या नौ हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तराय ही चित्त को विक्षिप्त करते हैं। अतः ये योगविरोधी हैं इन्हें योग के मल...

योगबीज

  Yoga Beej for UGC NET Yoga Exam योगबीज योगबीज ग्रंथ भगवान शिव के द्वारा कहा गया यह है, यह हठ योग परंपरा का पुरातन ग्रंथ है, योग के एक बीज के रूप में इस ग्रंथ को माना जाता है। भगवान शिव एवं माता पार्वती जी के संवाद रूप इस ग्रंथ में माता पार्वती प्रश्न करती हैं एवं भगवान शिव उनका उतर देते हैं। योगबीज में कुल 182 श्लोक है (कुछ पुस्तक में 190 भी लिखा हुआ प्राप्त होता है, इस ग्रन्थ में कोई भी अध्याय नहीं है। योगबीज के रचनाकार भगवान शिव एवं श्रोता माता पार्वती है। माता पार्वती जी को सुरेश्वरि भी योग बीज में कहा गया है। योगबीज में माता पार्वती मुख्य रूप से 12 प्रश्न करती है। योग बीज में सबसे प्रथम श्लोक में आदिनाथ शिव को प्रणाम किया गया है तथा इन्हे वृषभ नाथ भी इसमें कहा गया है। शिव को इसमें उत्पत्ति करता, पालक और संहार करता कहा गया है, और सभी क्सेशों को हरने बाला शिव को कहा गया है। 1- योगबीज के अनुसार - अहंकार के नष्ट होने से ही हमे मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है 2- योगबीज के अनुसार 5 प्राण होते है  (लेकिन इसमें 5 प्राण के नाम नहीं बताए गए है।) 3- योगबीज के अनुसार चित्त की शु...

चित्त | चित्तभूमि | चित्तवृत्ति

 चित्त  चित्त शब्द की व्युत्पत्ति 'चिति संज्ञाने' धातु से हुई है। ज्ञान की अनुभूति के साधन को चित्त कहा जाता है। जीवात्मा को सुख दुःख के भोग हेतु यह शरीर प्राप्त हुआ है। मनुष्य द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कर्म किया जाता है, या सुख दुःख का भोग किया जाता है, वह इस शरीर के माध्यम से ही सम्भव है। कहा भी गया  है 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात प्रत्येक कार्य को करने का साधन यह शरीर ही है। इस शरीर में कर्म करने के लिये दो प्रकार के साधन हैं, जिन्हें बाह्यकरण व अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। बाह्यकरण के अन्तर्गत हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियां एवं 5 कर्मेन्द्रियां आती हैं। जिनका व्यापार बाहर की ओर अर्थात संसार की ओर होता है। बाह्य विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्पर्क से अन्तर स्थित आत्मा को जिन साधनों से ज्ञान - अज्ञान या सुख - दुःख की अनुभूति होती है, उन साधनों को अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। यही अन्तःकरण चित्त के अर्थ में लिया जाता है। योग दर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त के नाम से प्रदर्शित किया गया है। परन्तु वेदान्त दर्शन अन्तःकरण चतुष्टय की...

Teaching Aptitude MCQ in hindi with Answers

  शिक्षण एवं शोध अभियोग्यता Teaching Aptitude MCQ's with Answers Teaching Aptitude mcq for ugc net, Teaching Aptitude mcq for set exam, Teaching Aptitude mcq questions, Teaching Aptitude mcq in hindi, Teaching aptitude mcq for b.ed entrance Teaching Aptitude MCQ 1. निम्न में से कौन सा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य है ? (1) पाठ्यक्रम के अनुसार सूचनायें प्रदान करना (2) छात्रों की चिन्तन शक्ति का विकास करना (3) छात्रों को टिप्पणियाँ लिखवाना (4) छात्रों को परीक्षा के लिए तैयार करना   2. निम्न में से कौन सी शिक्षण विधि अच्छी है ? (1) व्याख्यान एवं श्रुतिलेखन (2) संगोष्ठी एवं परियोजना (3) संगोष्ठी एवं श्रुतिलेखन (4) श्रुतिलेखन एवं दत्तकार्य   3. अध्यापक शिक्षण सामग्री का उपयोग करता है क्योंकि - (1) इससे शिक्षणकार्य रुचिकर बनता है (2) इससे शिक्षणकार्य छात्रों के बोध स्तर का बनता है (3) इससे छात्रों का ध्यान आकर्षित होता है (4) वह इसका उपयोग करना चाहता है   4. शिक्षण का प्रभावी होना किस ब...